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दुनिया स्वास्थ्य और आर्थिक आपदा से जूझ रही, भारत केंद्र सरकार द्वारा गढ़ी मानवीय आपदा में उलझ गया

इन कुछ आंकड़ों पर कुछ क्षणों के लिए ध्यान दें। ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, 80% लोग प्रति माह रु. 10,000 से कम कमाते हैं। यानी, यदि कोई इससे ज्यादा कमाता है तो वह देश के टॉप 20% में आएगा। विश्व बैंक के वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडिकेटर्स के अनुसार 76% लोग असुरक्षित रोज़गार में लगे हुए थे।

ग्लोबल फाइनैंशियल इंक्लूजन इंडेक्स 2017 के अनुसार, देश में केवल 17% के पास स्मार्टफोन हैं। अन्य अनुमान के अनुसार लगभग एक तिहाई के पास स्मार्टफोन हैं।

क्या इसका मतलब यह है कि लॉकडाउन के चलते जिन फंसे हुए, भूख से परेशान, घर जाने को आतुर मज़दूरों के वीडियो हम देख रहे हैं, वो इन ऊपरी 30% के हैं? क्या बाकी लगभग 70% हैं जो इनसे भी कठिन जिंदगी जीते हैं, जो आज न अखबारों में, न टीवी पर दिख रहे हैं? अन्य देशों में लॉकडाउन के पीछे सोच रही कि लोग घरों में रहें, तो बचाव होगा और प्रशासन को स्वास्थ्य इमरजेंसी पर केंद्रित होकर काम करने का मौका मिलेगा। भारत में विकसित देशों से भी ज्यादा कड़ा लॉकडाउन घोषित हुआ।

हमारे नीति निर्धारक भूल गए कि उन विकसित देशों के विपरीत हमारे यहां नौकरीशुदा आबादी केवल 17% है। एक तिहाई खुली मज़दूरी करते हैं। यानी अधिकतर रोज़ कमाकर खाते हैं। लगभग आधे स्वरोज़गार से कमाते हैं (यह नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े हैं)।

स्वरोज़गार में ऑटो रिक्शा वाला और दुकानदार जैसा ‘सक्षम’ व्यक्ति भी है, साथ ही सड़क किनारे जूते-साइकिल ठीक करने वाले, चाय-समोसे-सब्ज़ी-फले बेचने वाले से लेकर अति सक्षम उद्योगपति सब शामिल हैं। इनमें से अधिकतर के पास न मासिक वेतन का आश्वासन है और न ही बचत का सहारा।

यकायक लॉकडाउन घोषित हुआ। शहरी सक्षम वर्ग हड़बड़ी में खरीदारी करने निकल पड़ा। लेकिन रोज़ कमाने-खाने वालों के लिए सरकार ने कोई बात नहीं बताई। जो मज़दूर वर्ग अब तक आत्मनिर्भर था, अब फंस गया। सरकार ने उन्हें निहत्था छोड़ दिया। इसलिए जैसे ही घोषणा हुई, उनकी व्यथा सामने आने लगी।

मुसीबतों के चलते मज़दूरों को सैकड़ों किमी दूर घर, पैदल जाना मंज़ूर था, शहर में बेबस अपमानित ज़िंदगी मंज़ूर नहीं थी। लॉकडाउन से प्रशासन का ध्यान स्वास्थ्य पर केंद्रित होने के बजाय अपने हाथों से गढ़ी मानवीय इमरजेंसी का सामना करने में बंट गया। अब न केवल टेस्टिंग, कांटेक्ट ट्रेसिंग, मरीज़ और डॉक्टर पर ध्यान देने की ज़रूरत रही, जैसे-जैसे मज़दूरों की व्यथा सामने आई, सरकारी व्यवस्था के लिए उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता गया।

इस आपदा में राज्य सरकारों ने मज़दूरों की परेशानी आंकने में कम देर की और राहत पहुंचाने के बारे में सोचना भी शुरू किया। केंद्र सरकार का रवैया निराशाजनक रहा है।

पहले मज़दूरों के बारे में सोचे बिना लॉकडाउन का निर्णय, फिर पांच सप्ताह तक मज़दूरों को तड़पाने के बाद रोज़गार खोलना, साथ ही घर जाने की अनुमति देना। जब लगने लगा कि मज़दूर नहीं ठहरेंगे तो कुछ राज्य सरकारों ने ट्रेन-बस चलाने का निर्णय वापस लेने की कोशिश की। ट्रेन के लिए भी लंबी लाइन है। आवेदन प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया गया है, जिससे मज़दूरों के लिए मुश्किल हो रही है। इतना ही नहीं, ट्रेन में न खाना है न पानी।

कहीं ट्रेनें भटक रही हैं। भारत में मज़दूर वर्ग के साथ अन्याय नई बात नहीं है। कोरोना के चलते उनके साथ हो रहे अन्याय को सामने आने का मौका मिला है। पहले उम्मीद थी कि शायद सक्षम वर्ग इसे बर्दाश्त करने से इनकार करेगा और आवाज़ उठाएगा, लेकिन धीरे-धीरे हम आदी होते जा रहे हैं। जहां पूरी दुनिया दो आपदाओं का सामना कर रही है, स्वास्थ्य और आर्थिक, भारत में हमें तीन आपदाओं से जूझना पड़ रहा है।तीसरी आपदा मानवीय आपदा, केंद्र सरकार द्वारा स्वसृजित है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं।


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