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व्यापार चलाने को कर्ज लिया था और लॉकडाउन लग गया, फाइनेंसर बाउंसर भेजने लगा, वो गाली देते और घर तबाह करने की धमकी देते थे

दोनों भाइयों में बड़ा प्यार था। आस-पड़ोस से लेकर नाते-रिश्तेदार भी उन्हें राम-लक्ष्मण कहते थे। जो बड़ा कहता, वही छोटा वाला करता। हर काम में साथ-साथ। सुबह, शाम और दोपहर बस काम-काम और काम। इसी काम ने मेरे दोनों लालों को हमसे छीन लिया। दोनों भाई एक साथ चले गए। ये भी नहीं सोचा कि उनके बाद हमारा क्या होगा? बच्चों का क्या होगा?’

इतना कहते-कहते 78 साल के अधेश्वर दास गुप्ता कांपने लगते हैं। बगल में खड़ी उनकी पत्नी सहारे के लिए हाथ आगे बढ़ाती हैं। उनकी पत्नी का नाम उषा है और उम्र 72 साल है। अधेश्वर दास के होंठ कंपकपा रहे हैं। वो कुछ बोल रहे हैं, लेकिन गले से आवाज नहीं निकल रही। उनकी सूनी आंखें सामने दीवार पर टिकी हैं। सुधबुध गंवा चुके पति को सहारा देकर बैठाने के बाद उषा कहती हैं, 'बच्चों को हमारी इतनी भी चिंता नहीं करनी चाहिए थी। वो डरते थे कि कहीं पैसा मांगने वाले लोग हमारे बूढ़े मां-बाप को ना कुछ बोल दें। इज्जत की फिक्र थी। कितने कष्ट में रहे होंगे हमारे लाल कि एक साथ फांसी लगा ली?'

दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में जिन दो सगे भाइयों ने एक साथ आत्महत्या की, उनके माता-पिता।

इतना कहकर वो आंचल से अपना चेहरा ढंक लेती हैं और भीतर से सिसकियों की आवाज आने लगती है। उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ रहा है, क्योंकि घर के भीतर खेल रहे दो छोटे-छोटे बच्चों को फिलहाल वो सब पता ना चले, जिसे सहने और समझने लायक उनकी उम्र नहीं है। वो आंसू रोकने की कोशिश करती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि रोने की आवाज से पास बैठे अधेश्वर दास की तबीयत और खराब हो जाएगी।

दिल्ली के चांदनी चौक में गली बेरी के आखिरी छोर पर अपने पुश्तैनी मकान में रह रहे इन दो बुजुर्गों की जिंदगी के सारे रंग 26 अगस्त की दोपहर को गायब हो गए। 25 अगस्त की रात तक ‘हैप्पी फैमिली’ के हर पैमाने पर खरा उतरने वाले इस परिवार को अगले दिन से दुःख, संताप और शोक के काले बादलों ने घेर लिया। कारण, इस परिवार के दो कमाऊ पूतों ने एक साथ फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

47 साल के अंकित और 42 साल के अर्पित गुप्ता पिछले दस साल से चांदनी चौक के बाजार में कृष्णा ज्वेलर्स नाम की दुकान चलाते थे। दोनों भाई अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे थे। लॉकडाउन के बाद व्यापार में आई मंदी और बढ़ते कर्ज की वजह से इन दोनों भाइयों ने अपनी दुकान में ही फांसी लगा ली।

उस दिन को याद कर उषा गुप्ता एक बार फिर सिसकने लगती हैं। फिर हिम्मत जुटाने के बाद कहती हैं, ‘एक रात पहले हम सब ने साथ में खाना खाया था। वो अपने काम के बारे में ज्यादा बताते नहीं थे, फिर भी इतना तो मालूम था कि परेशान हैं। सुबह दुकान पर जाते हुए रोज की तरह दोनों भाइयों ने हम दोनों के पैर छुए थे। हमें क्या मालूम था कि वो आखिरी बार पैर छू रहे हैं।’

चांदनी चौक स्थित वह दुकान जहां दोनों भाइयों ने फांसी लगाकर जान दे दी। दोनों पर लाखों रुपए का कर्ज था।

उषा देवी की हिम्मत जवाब दे चुकी है और वो रोने लगती हैं। बगल में बैठे अधेश्वर दास गुप्ता किसी भी सवाल का जवाब देने की हालत में नहीं हैं। कुछ पूछने पर केवल इतना कहते हैं, ‘कुछ समझ नहीं आ रहा। क्या पूछ रहे हैं आप?’

कमरे में इन दोनों के अलावा उषा की भाभी मंजू गुप्ता भी मौजूद हैं, जो परिवार के दूसरे सदस्यों के वास्ते इन्हें चुप हो जाने के लिए कह रही हैं। अपने भांजों को याद करते हुए मंजू कहती हैं, ‘व्यापार चलाने के लिए बच्चों ने कर्ज ले रखा था। फिर लॉकडाउन लग गया। जिससे कर्ज लिया था वो दुकान पर बाउंसर भेजने लगे। गालियां देने लगे और घर-परिवार को भी तबाह करने की बात कहते थे। बच्चे चोर-लफंगे तो थे नहीं कि इस सब से निपट पाते। कुछ नहीं सूझा तो गलत काम कर बैठे।’

परिवार के मुताबिक, दोनों भाइयों ने एक प्राइवेट फाइनेंसर से कर्ज लिया था। लॉकडाउन की वजह से तीन महीने दुकान और फिर काम एकदम बंद हो गया। व्यापार ठप रहा, लेकिन कर्ज देने वाले फाइनेंसर ने अपने पैसों की वसूली के लिए उन्हें फोन पर धमकाना, फिर दुकान पर बाउंसर भेजना और गाली-गलौज करना शुरू कर दिया था। परिवार का तो यहां तक कहना है कि जन्माष्टमी से दो रोज पहले दुकान पर बाउंसरों ने खूब बदतमीजी की। दोनों को गंदी-गंदी गालियां दीं और पैसे न मिलने पर पूरे परिवार को तबाह करने की धमकी दी थी।

अंकित और अर्पित की आत्महत्या ने केवल एक परिवार को बेसहारा नहीं किया है, बल्कि इन दो भाइयों के इस कदम से सिस्टम एक बार फिर बेनकाब हुआ है। घटना के छह दिन बाद तक किसी भी राजनीतिक पार्टी का कोई भी नुमाइंदा इनका हालचाल लेने तक यहां नहीं पहुंचा है।

मां कहती हैं कि दुकान पर जाते समय रोज की तरह दोनों भाइयों ने हमारे पैर छू कर आशीर्वाद लिए थे। हमें क्या पता था कि वे आखिरी बार पैर छू रहे हैं।’

अविनाश अग्रवाल पिछले बीस साल से दिल्ली-6 में ही अपनी ज्वेलरी शॉप चलाते हैं। प्राइवेट फाइनेंसर से लोन की जरूरत क्यों पड़ी? इस सवाल पर कहते हैं, ‘जाहिर सी बात है। बैंक लोन देता नहीं। मैं व्यापारी हूं। मुझे कल ही कुछ माल उठाना है। माल एक करोड़ रुपए का है। मेरे पास चालीस लाख ही हैं। अब कैसे होगा? क्या एक दिन में सरकारी बैंक मुझे लोन दे देगा? चलो, एक हफ्ते में दे देगा? मेरा जवाब है, नहीं। आप चाहे तो चेक कर लो। अब ऐसे में मुझे पैसे के लिए तो प्राइवेट फाइनेंसर के पास ही जाना होगा। ज्यादा ब्याज भी देना होगा और इसके खतरे अलग हैं, लेकिन रास्ता क्या है?’

चांदनी चौक अपने व्यापार के लिए देशभर में जाना जाता है। यहां बड़ी संख्या में ज्वेलरी का कारोबार भी होता है। सीताराम बाजार में पिछले कई सालों से ज्वेलरी शॉप चला रहे कमल गुप्ता के मुताबिक, सोने का वायदा कारोबार और व्यपारियों में इसे लेकर बढ़ी दिलचस्पी मुख्य वजह है। वो कहते हैं, ‘इसमें कोई दो राय नहीं है कि लॉकडाउन ने कमर तोड़ दी है। सरकार केवल घोषणाएं कर रही है। आज भी हमें बिना गिरवी रखे बैंक एक लाख रुपए का लोन नहीं देता।

चार-पांच रोज भागना होता है सो अलग। लेकिन, इन दोनों के मामले में ‘वायदा बजार’ एक बड़ी वजह है। जो जानकारी मुझे है उसके मुताबिक, दोनों इस काम में लगे हुए थे। जो लोग ये काम करवाते हैं या आपको पैसे देते हैं, वो ही इस तरह से पैसों की वसूली भी करते हैं। इसे आप व्यापारियों का जुआ मानिए। खेलिए। जीते तो ठीक। हार गए तो सब सत्यानाश। पता नहीं सरकार क्यों जुआ खिलवा रही है?

वायदा बाजार मतलब व्यापार की वो जगह जहां वास्तव में न तो कोई दुकान होती है, न ही व्यापारी और न ही कोई ग्राहक। सब इंटरनेट पर होता है। कमल सहित इलाके के कई दूसरे व्यपारी इन दो भाइयों की आत्महत्या के पीछे ‘वायदा बाजार’ को एक मजबूत वजह मानते हैं। वर्ष 2003 से ही इलाके के व्यापारी इस काम में लगे हैं और जल्दी से जल्दी अच्छी कमाई का जरिया मानते हैं। ऐसा नहीं है कि अंकित और अर्पित ही ऐसे व्यापारी थे जो इस ‘बाजार’ में अपनी किस्मत आजमा रहे थे। चांदनी चौक में काम कर रहे ज्यादतर व्यापारी नियमित तौर से ‘वायदा बाजार’ में अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन, कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन और इस वजह से व्यापार में आई कमी ने ज्यादातर व्यापारियों के जीवन में अंधेरा फैला दिया है।

दरवाजे पर खड़ी दोनों भाइयों की मां। 47 साल के अंकित और 42 साल के अर्पित पिछले दस साल से चांदनी चौक के बाजार में कृष्णा ज्वेलर्स नाम की दुकान चलाते थे।

एक हजार सदस्यों वाला कूचा महाजनी ज्वेलरी एसोसिएशन चांदनी चौक का सबसे बड़ा ज्वेलर्स एसोसिएशन है। योगेश सिंघल इसके अध्यक्ष हैं और खुद एक बड़ी ज्वेलरी शॉप के मालिक हैं। वो कहते हैं, ‘मेरे पास कई व्यापारियों के फोन आते हैं। कोई लाखों के कर्ज में है तो कोई करोड़ों के। आपको भरोसा नहीं होगा, लेकिन हर व्यापारी की नींद हराम है। जिन दो भाइयों ने आत्महत्या की, उनकी भी यही स्थिति थी। गद्दे पर काम कम हुआ तो मुनाफे के लालच में व्यापारियों ने ‘वायदा बाजार’ का रुख किया। उन पर कर्ज बढ़े और बढ़ते चले गए। कर्ज चुकाने की उनकी क्षमता कम हुई। नोटबंदी से किसी तरह संभले तो लॉकडाउन ने जान निकाल दी।’

अंकित गुप्ता और अर्पित गुप्ता की आत्महत्या के बाद इलाके के व्यापारियों में एक दहशत का माहौल है और ये किसी एक परिवार या एक व्यापारी की बात नहीं है। बहुत से ऐसे व्यापारी हैं, जो गले तक कर्ज में डूबे हुए हैं। वो भी ऐसे वक्त में जब कारोबार पिछले छह महीने से पूरी तरह से ठप है और अगले छह महीने भी ठप ही रहने वाला है। यही वजह है कि कूचा महाजनी ज्वेलर्स एसोसिएशन सितंबर के पहले हफ्ते में अपने सभी सदस्यों के साथ ऑनलाइन मीटिंग करने वाला है और सरकार के सामने व्यापारियों के मन की असुरक्षा को सामने रखने वाला है।



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Two brothers commit suicide inside Chandni Chowk's jewellery shop


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