Skip to main content

दुष्यंत कुमार का जन्मदिन; दूसरे विश्वयुद्ध की 81 साल पहले शुरुआत; एलआईसी ने शुरू किया था काम

आज ही के दिन 1933 में उत्तरप्रदेश के बिजनौर में मशहूर कवि और गज़ल लेखक दुष्यंत कुमार का जन्म हुआ था। सिर्फ 42 साल की उम्र में हार्ट अटैक की वजह से उनका निधन हुआ। लेकिन इतनी कम उम्र में भी दुष्यंत ने ऐसी रचनाएं लिखीं कि अमर हो गए।

दुष्यंत की रचनाओं की खासियत थी उनका दायरा। कभी तो वे आपातकाल की पृष्ठभूमि में क्रांतिकारी अंदाज में लिखते “कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो', तो कभी रोमांटिक अंदाज में कहते -“तू किसी रेल-सी गुजरती है, मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं।”

दुष्यंत कुमार या दुष्यंत कुमार त्यागी शुरुआत में दुष्यंत कुमार परदेशी के नाम से लिखा करते थे। भोपाल उनकी कर्मभूमि रही। वे आपातकाल में संस्कृति विभाग में काम करते हुए भी सरकार के खिलाफ लिखते रहे। इसका खामियाजा भी उन्हें उठाना पड़ा।

  • 81 साल पहले दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ

1914 से 1918 तक पहला विश्वयुद्ध हुआ और कई संधियों के साथ खत्म हुआ था। लेकिन कई मुद्दे अनसुलझे थे, जिनकी वजह से अस्थिरता और तनाव कायम था। एक सितंबर 1939 को करीब 15 लाख सैनिकों के साथ एडॉल्फ हिटलर की जर्मन सेना ने पोलैंड पर हमला बोल दिया। ब्रिटेन और फ्रांस ने दो दिन बाद हिटलर की सेना पर जवाबी कार्रवाई की। 1939 से 1945 तक चला दूसरा विश्वयुद्ध करीब-करीब पूरी दुनिया में ही हुआ। इस विश्व युद्ध की धुरी बने थे जर्मनी, इटली और जापान। इनका मुकाबला करने के लिए फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका और सोवियत संघ साथ आए थे। करीब 4 से 5 करोड़ लोग मारे गए थे। यह इतिहास का सबसे लंबे वक्त तक चला युद्ध है।

  • 64 साल पहले एलआईसी ने आकार लिया था

जनवरी 1956 को भारत सरकार ने उस समय देश में कारोबार कर रही 245 बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया था। अब इन कंपनियों को एक छत के नीचे लाने के लिए संगठन की जरूरत महसूस हो रही थी। तब जून 1956 में संसद में एलआईसी एक्ट पारित हुआ। इस तरह पांच करोड़ रुपए के फंड के साथ एक सितंबर 1956 को जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी ने आकार लिया। आज इसके लगभग 2048 कार्यालय देश के कोने-कोने में है। दस लाख से ज्यादा एजेंट वाला एलआईसी देश में होने वाले बीमा कारोबार में 77 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है।

इतिहास के पन्नों में आज के दिन को इन घटनाओं की वजह से भी याद किया जाता है…

  • 1807: अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति आरोन राजद्रोह के मामले में निर्दोष पाए गए।
  • 1878: एम्मा एम नट्ट अमेरिका में पहली महिला टेलीफोन ऑपरेटर बनीं।
  • 1947: भारतीय मानक समय अस्तित्व में आया।
  • 1962: महाराष्ट्र के कोल्हापुर में शिवाजी विद्यापीठ की स्थापना हुई।
  • 1994: उत्तरी आयरलैंड में आयरिन रिपब्लिकन आर्मी ने युद्ध विराम लागू किया।
  • 1997: साहित्यकार महाश्वेता देवी तथा पर्यावरणविद एमसी मेहता को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया।
  • 2005: सद्दाम हुसैन ने सशर्त रिहाई की अमेरिकी पेशकश ठुकराई।


आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें
Birth of the popular Hindi poet Dushyant Kumar 87 years ago and the formal start of the Second World War.


https://ift.tt/3jwmIgh

Comments

Popular Posts

आप शेयर ट्रेडिंग करते हैं तो यह जानना आपके लिए जरूरी है; एक सितंबर से बदल रहा है मार्जिन का नियम

शेयर बाजार में एक सितंबर से आम निवेशकों के लिए नियम बदलने वाले हैं। अब वे ब्रोकर की ओर से मिलने वाली मार्जिन का लाभ नहीं उठा सकेंगे। जितना पैसा वे अपफ्रंट मार्जिन के तौर पर ब्रोकर को देंगे, उतने के ही शेयर खरीद सकेंगे। इसे लेकर कई शेयर ब्रोकर आशंकित है कि वॉल्युम नीचे आ जाएगा। आइए समझते हैं क्या है यह नया नियम और आपकी ट्रेडिंग को किस तरह प्रभावित करेगा? सबसे पहले, यह मार्जिन क्या है? शेयर मार्केट की भाषा में अपफ्रंट मार्जिन सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्दों में से एक है। यह वह न्यूनतम राशि या सिक्योरिटी होती है जो ट्रेडिंग शुरू करने से पहले निवेशक स्टॉक ब्रोकर को देता है। वास्तव में यह राशि या सिक्योरिटी, बाजारों की ओर से ब्रोकरेज से अपफ्रंट वसूली जाने वाली राशि का हिस्सा होती है। यह इक्विटी और कमोडिटी डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग से पहले वसूली जाती है। इसके अलावा स्टॉक्स में किए गए कुल निवेश के आधार पर ब्रोकरेज हाउस भी निवेशक को मार्जिन देते थे। यह मार्जिन ब्रोकरेज हाउस निर्धारित प्रक्रिया के तहत तय होती थी। इसे ऐसे समझिए कि निवेशक ने एक लाख रुपए के स्टॉक्स खरीदे हैं। इस...

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के 100 साल, जिसके लिए महात्मा गांधी भीख मांगने को तैयार थे

दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया (राष्ट्रीय इस्लामी विश्वविद्यालय) एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, जो आज 100 साल पूरे कर रही है। 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ़ में छोटी संस्था के तौर पर शुरू होकर एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने तक की इसकी कहानी कई संघर्षों से भरी है। गांधीजी के कहने पर ब्रिटिश शासन के समर्थन से चल रही शैक्षणिक संस्थाओं का बहिष्कार शुरू हुआ था। राष्ट्रवादी शिक्षकों और छात्रों के एक समूह ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छोड़ा और जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नींव पड़ी। स्वतंत्रता सेनानी मौलाना महमूद हसन ने 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ़ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नींव रखी। यह संस्था शुरू से ही कांग्रेस और गांधीजी के विचारों से प्रेरित थी। 1925 में आर्थिक सेहत बिगड़ी तो गांधीजी की सहायता से संस्था को करोल बाग, दिल्ली लाया गया। तब महात्मा गांधी ने यह भी कहा था- जामिया को चलना होगा। पैसे की चिंता है तो मैं इसके लिए कटोरा लेकर भीख मांगने के लिए भी तैयार हूं। बापू की इस बात ने मनोबल बढ़ाया और संस्था आगे बढ़ती रही। भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन महज 23 साल की उम्र में जामिया...