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‘अल्पसंख्यकों के विरुद्ध युद्ध’ की बात न करें, ऐसी बातें सिर्फ बहुसंख्यकों के खिलाफ चल रहे गंभीर युद्ध से ध्यान हटाती हैं

मुझे हाल ही में मेरे एक मित्र प्रभु गुप्तारा से रोचक ईमेल मिला। उन्होंने मुझसे और अन्य उदारवादी नेताओं से यह गुहार लगाई कि हम ‘अल्पसंख्यकों’ को नागरिक स्वतंत्रताएं और मानव अधिकार न मिलने की बीन बजाना बंद कर दें। प्रभु ईसाई हैं और वे हिन्दुत्व के तर्क की पुरातन शैली का सहारा नहीं ले रहे हैं।

इसके विपरीत, उन्होंने कहा कि हमारी मौजूदा सत्तारूढ़ सरकार के बड़े हिस्से द्वारा किया जा रहा हमला ‘अल्पसंख्यकों के विरुद्ध है, यह सही है, लेकिन उसकी भीड़ हमारे बहुसंख्यकों के खिलाफ भी लगातार युद्ध लड़ रही है।’

वे पूछते हैं, ‘क्या केवल अल्पसंख्यक ही स्वतंत्र भारत की प्रगति के मुख्य लाभार्थी हैं, या ये वास्तव में बहुसंख्यक हैं? हमारे संविधान के लाभ, हमारे सुप्रीम कोर्ट, शिक्षा तंत्र, अर्थव्यवस्था के लाभ स्वाभाविक रूप से बहुसंख्यकों तक ही पहुंचते हैं और केवल अल्पसंख्यकों तक नहीं।’

जब अधिकार देने से इनकार किया जाता है, असहमति को हल्के में लिया जाता है, सामाजिक कार्यकर्ता जेल में डाल दिए जाते हैं या उनकी आजादी सीमित कर दी जाती है, तब अल्पसंख्यकों की तुलना में बहुसंख्यक कहीं ज्यादा पीड़ित होते हैं।

अगर अल्पसंख्यक हमारे देशभर में फैली सांप्रदायिक कट्टरता का शिकार होते हैं, तो बहुसंख्यक भी शिकार होते हैं। जैसा प्रभु ने आगे कहा, ‘क्या गौरी लंकेश अल्पसंख्यक थीं? नरेंद्र दाभोलकर? एस.आर. दारापुरी? जज लोया? स्वानी अग्निवेश?’

जब बॉलीवुड पर हमला होता है, तब क्या इसके सिनेमाई उत्पादों को बहुसंख्यक प्यार नहीं देते हैं? अगर जेएनयू के खिलाफ नफरत फैलती है या सख्ती होती है, तो क्या इस संस्थान को बहुसंख्यकों द्वारा संरक्षण नहीं दिया जाता है?

प्रभु का तर्क यह है कि आज की प्रतिगामी और विभाजनकारी नीतियों के आलोचकों को ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए, जब ‘युद्ध हमारे बहुसंख्यकों के नाम पर लड़ा जा रहा है, जबकि यह बहुसंख्यकों के विरुद्ध है।’

मैं उनका तर्क स्वीकार करता हूं, लेकिन मैं बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के मूल विचार पर ही सवाल उठाता रहा हूं। मेरी हाल ही में आई नई किताब, ‘द बैटल ऑफ बिलॉन्गिंग’, जो राष्ट्रवाद, देशभक्ति और भारतीय होने के मायने पर आधारित कृति है, उसमें मैं इस कथन पर वापस आया हूं कि भारत में हम सभी अल्पसंख्यक हैं।

किताब में मैंने इस तथ्य पर बात की है कि कई लोग ‘बहुसंख्यक समुदाय’ शब्द को उछालने में आनंद पाते हैं, लेकिन अक्सर ही यह बहुत भ्रामक होता है। लिंग, जाति, भाषा और इनके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा है, जो अक्सर खुद को ‘बहुसंख्यक समुदाय’ का सदस्य बताने वाले व्यक्ति को तुरंत ही अल्पसंख्यक बना देता है।

अगर माइकल इग्नाटीफ के मशहूर कथन को उल्टा कर कहूं तो, ‘हम खून यानी संबंध से कहीं ज्यादा, संबद्धता वाले देश हैं।’ बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की हमारी धारणाएं चुनावी राजनीति का नतीजा हैं क्योंकि चुनावी बहुमत पाने की इच्छा ही ज्यादातर आज के राजनीतिक बहुसंख्यकवाद को चलाती है।

पुराना फॉर्मूला यह था कि आप अल्पसंख्यकों के गठबंधन से बहुमत बनाते थे। अब सत्तारूढ़ पार्टी हिन्दू पहचान का शोर करती है, जो जाति, धर्म, भाषा व लिंग के अंतरों को सम्मिलित कर देती है और ऐसा कर उन्होंने बहुसंख्यक आधार की इच्छा के चलते अल्पसंख्यकों को हाशिये पर ला दिया।

हिन्दुत्व नेताओं ने कोशिश की है कि वे ‘गौरवान्वित हिन्दू’ होने को भारतीय होने से ज्यादा महत्वपूर्ण बना दें। फिर भी, जैसा मैंने तर्क दिया है, भारतीय राष्ट्रवाद अब एक दुर्लभ प्राणी है। यह देश अपने नागरिकों पर कोई संकीर्ण अनुरूपता लागू नहीं करता। आप बहुत कुछ हो सकते हैं और एक चीज भी। आप अच्छा मुस्लिम, अच्छे केरल निवासी और अच्छे भारतीय, यह सब एक साथ हो सकते हैं। यही तो हमारे बहुलवाद की शक्ति है।

बहुलवाद मुख्यरूप से विभिन्न समुदायों के सह-अस्तित्व के बारे में है, जो कि केवल एक रोमांटिक विचार नहीं है, बल्कि सदियों से हमारे रहने का तरीका है और शायद इस देश की सबसे बड़ी ताकत है। बहुसंख्यकवाद को भ्रम है कि वह बहुसंख्यकों की बात करता है, जबकि वह हमें बांटता है।

वह समरूपता चाहता है और इसलिए एकता को कमजोर करता है। मतभेदों का दबाने की बजाय उन्हें स्वीकार कर एकता बनाए रखना ज्यादा आसान है। तो, मैं प्रभु से सहमत हूं कि हमें समावेशी राष्ट्रीयता को प्रोत्साहित करने के लिए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की बात करना बंद कर देना चाहिए।

हमें इस पर फिर जोर देना चाहिए कि पहचान का ऐसा तुच्छ राजनीतिकरण वास्तव में बहुसंख्यकों को एक करने की जगह बांटता है। और मेरे जैसे नेताओं को मतदाताओं को याद दिलाना चाहिए कि उनकी सांप्रदायिक पहचान से कहीं ज्यादा जरूरी ऐसे मुद्दे हैं जो उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करते हैं।

आखिर में प्रभु के ही शब्दों में कहूं तो अब हम ‘अल्पसंख्यकों के विरुद्ध युद्ध’ की बात न करें, क्योंकि ऐसी बातें सिर्फ हमारे बहुसंख्यकों के खिलाफ चल रहे कहीं ज्यादा गंभीर युद्ध से ध्यान हटाती हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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शशि थरूर, पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद


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