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हिमाचल में किसानों की आय में इजाफा, पंजाब में मेहनत के मुताबिक दाम नहीं, महाराष्ट्र में कंपनी नहीं देती मुआवजा

नए कृषि कानूनों के विरोध में किसानों ने दिल्ली को घेर रखा है। आरोप है कि सरकार कॉर्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचा रही है। भास्कर ने देश के उन पांच राज्यों से जमीनी हकीकत जानने की कोशिश की जहां इन कानूनों के बहुत पहले से ही कंपनियों और किसानों के बीच कॉन्ट्रैक्ट का फॉर्मूला चल रहा है।

पंजाब: कंपनी माल खराब बता लौटा दे तो नुकसान किसान को उठाना पड़ता है

पंजाब में सिर्फ निजी कंपनियां ही नहीं सरकारी संस्था पंजाब एग्रो फूड ग्रेन इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन भी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करवाती है। मुख्यत: जौ, आलू, बेबी कॉर्न, मटर, ब्रोकली, स्वीट कॉर्न, सनफ्लावर, टमाटर, मिर्ची इत्यादि की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग हो रही हैै। आलू की खेती करने वाले किसान रुपिंदर ने बताया कि किसान को प्राइवेट कंपनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने पर कोई बहुत ज्यादा फायदा नहीं होता। बस उन्हें कंपनी की ओर से नया सीड जरूर मिल जाता है।

सब्जियों में कंपनियां खराब क्वालिटी या ग्रेडिंग की बात कहकर 30 से 40 क्विंटल का माल कई बार वापस कर देती है। जिसका नुकसान किसान को उठाना पड़ता है। वहीं, कई कंपनियां खराब क्वालिटी बताकर तय राशि से कम पेमेंट करती हैं। शुरुआत तीन-चार साल बाद किसानों को मेहनत के मुताबिक दाम नहीं मिलते। लुधियाना स्थित फील्डफ्रेश कंपनी के मैनेजर कमलजीत सिंह ने बताया कि उनकी कंपनी किसानों को फिक्स प्राइस दिया जाता है।

महाराष्ट्र: राज्य में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए अब तक कोई गाइडलाइन तय नहीं

केंद्र कृषि कानूनों को महाराष्ट्र में लागू करने के लिए राज्य सरकार ने मंत्रियों की एक कमेटी का गठन किया है। हालांकि अब तक राज्य में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग अपनाने वाले किसानों को फायदे से ज्यादा नुकसान ही हुआ है। राज्य में इसकी अब तक कोई गाइडलाइन भी तय नहीं है। यहां 5-6 कंपनियां आलू, कपास और सब्जियों की खेती का किसानों से कॉन्ट्रैक्ट करती हैं। पुणे जिले की खेड तहसील में आलू की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने वाले कैलाश आढवले कहते हैं कि कंपनी कम कीमत पर बीज और कीटनाशक देती है।

वैसे तो कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन यदि फसल को कोई नुकसान हुआ तो कंपनी कोई मुआवजा नहीं देती। पुणे के ही मंचर के किसान दीपक थोरात एक निजी कंपनी के लिए ब्रोकर का काम भी करते हैं। उनका कहना है कि ब्रोकर को 50 पैसे प्रति किलो कमीशन मिलता है। राज्य के कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर पांडुरंग सिगेदर का कहना है कि केंद्र के कानून में राज्य सरकार सिर्फ गिने-चुने निर्णय ले सकती है।

तमिलनाडु: कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पर कानून है, फिर भी किसानों के 143 करोड़ कंपनियों पर बकाया

तमिलनाडु कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पर कानून बनाने वाला पहला राज्य है। अक्टूबर, 2019 में ही यहां एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस एंड लाइवस्टॉक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एंड सर्विसेज एक्ट लागू है। कहने को इस एक्ट में केंद्र के कृषि कानूनों से भी बेहतर प्रावधान हैं। राज्य के कृषि सचिव गगनदीप सिंह बेदी कहते हैं कि राज्य के कानून के तहत किसानों के लिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग बिल्कुल वैकल्पिक है। वह चाहें तो अपनी उपज मंडियों में बेच सकते हैं।

राज्य में किसानों के पास उपज बेचने के लिए भी तीन विकल्प हैं-सरकारी मंडियां, गैर सरकारी मंडियां और डायरेक्ट प्रोक्योरमेंट सेंटर्स। यदि कोई कंपनी किसान से खेती का कॉन्ट्रैक्ट एक तय मूल्य पर करती है और बाद में उस उपज के दाम गिर भी जाएं तो कंपनी को पहले से तय दर से ही भुगतान करना होगा। तिरुनेलवेल्ली जिले के कन्नीयन का परिवार दशकों से खेती करता है। उनकी मुख्य उपज गन्ना है और इसके लिए वह चीनी मिल मालिकों और कंपनियों से कॉन्ट्रैक्ट भी करते हैं। मगर इन्हें 18 माह से पेमेंट नहीं दिया।

हिमाचल प्रदेश: पहले सेब लेकर दिल्ली जाना पड़ता था, अब घर बैठे अकाउंट में आता है पैसा

शिमला के सेब उत्पादक किसान कहते हैं कि प्राइवेट प्रोक्योरमेंट सेंटर होने से उन्हें बहुत राहत मिली है और वे अब पहले से ज्यादा कमाई कर रहे हैं। उन्हें किसी बिचौलिए से डील नहीं करना पड़ता है। स्थानीय किसान बताते हैं कि उन्हें पहले सेब बेचने के लिए दिल्ली जाना पड़ता था। अब ये प्राइवेट सेंटर ही खरीदारी कर लेते हैं। किसाना 10-12 हजार कैरेट सेब इन सेंटरों पर बेच रहे हैं। सेंटर किसानों को सीधे उनके बैंक अकाउंट में भुगतान कर देते हैं। पहले ग्रेडिंग अधिकारी को काफी कमीशन देना पड़ता था।

अब इस राशि की बचत हो रही है। कुछ कंपनियां यहां साल 2006 से ही सेब की खरीदारी कर रही है। यहां किसानों से सेब खरीदने वाली एक कंपनी के अधिकारी ने कहा कि वे यहां के सेब अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचते हैं। इसलिए क्वालिटी पर बहुत ज्यादा ध्यान होता है औक करीब 12 फीसदी सेब रिजेक्ट हो जाते हैं। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से स्थानीय स्तर पर रोजगार में भी इजाफा हुआ है।

केरल: कॉन्ट्रैक्ट नहीं को-ऑपरेटिव फार्मिंग पर जोर, अब तक सफलता भी मिली

राज्य सरकार ने पहले ही घोषणा कर दी है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के बजाय वह को-ऑपरेटिव फार्मिंग को बढ़ावा देगी। रगरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण जैसी योजनाओं को भी को-ऑपरेटिव फार्मिंग से जोड़ा गया है। कृषि मंत्री वी.एस. सुनील कुमार आरोप लगाते हैं कि केंद्र किसानों को बड़े कॉर्पोरेट्स के चंगुल में फंसा रहा है, हमारे राज्य में को-ऑपरेटिव फार्मिंग का सफल फॉर्मूला लागू है। सरकार इस व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए को-ऑपरेटिव्स को बैंक ऋण की राह भी आसान करेगी।

ऑल इंडिया किसान सभा के अध्यक्ष अशोक धावाले बताते हैं कि को-ऑपरेटिव फार्मिंग का अर्थ है सामूहिक हिस्सेदारी और सामूहिक श्रम। राज्य में ब्रह्मगिरी डेवलपमेंट सोसाइटी (बीडीएस) जैसे को-ऑपरेटिव समूह इसी मॉडल पर काम करते हैं। वायनाड जिले में काम करने वाले बीडीएस का गठन ट्रेड लिबरलाइजेशन के दौर में हुआ था जब केरल के काली मिर्च और कॉफी जैसी फसलों की कीमतें अचानक गिरने से सैकड़ों किसानों ने आत्महत्या कर ली थी।



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किसान फाइल फोटो


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