Skip to main content

आतंकियों ने दो परिवारों के इकलौते बेटे छीने; लोग गुस्से में हैं और नेता खौफजदा

घाटी में युवा नेताओं की हत्या की साजिश सिर्फ कुलगाम तक सीमित नहीं है। 370 हटने के बाद बदले हुए माहौल में युवाओं का मुख्यधारा में आना आतंकियों को बड़ा खतरा दिख रहा है। क्योंकि, कश्मीरी युवाओं के दम पर ही सरहद पार बैठे आतंक के आका यहां दहशत बनाए हुए हैं। गुरुवार को भाजपा नेता फिदा हुसैन, उमर राशिद और उमर हाजम की हत्या भी इसी साजिश का हिस्सा है।

आतंकियों ने इस हमले में दो परिवारों के इकलौते बेटे छीने हैं। फिदा हुसैन परिवार का इकलौता सहारा था। मां-बाप बुजुर्ग हैं। दो बहनें हैं। मां ने बिलखते हुए कहा- ‘अब हम किसके सहारे जिएंगे।’ बुजुर्ग पिता भीड़ के बीच बात करने की स्थिति में भी नहीं थे। इसी तरह उमर राशिद ड्राइवर था। वह भी बुजुर्ग मां-बाप और दो बहनों का इकलौता सहारा था। बहनें गहरे सदमे में हैं।

उन्होंने बताया कि वे सिर्फ भाई के लिए इंसाफ चाहती हैं। चीत्कार के बीच उठे तीनों जनाजों में हजारों की भीड़ उमड़ी। अंतिम रस्म अता करते हुए मौलवी कह रहे थे- हे अल्लाह! इस कत्लेआम को रोकें। कश्मीर में और कितने लोग इस तरह मारे जाएंगे? इन हत्याओं से इलाके के लोग बहुत गुस्से में हैं। उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों से मांग की कि हत्यारों को जल्द उनके अंजाम तक पहुंचाया जाए। वहीं, दूसरी ओर इस घटना से नेताओं में खौफ बढ़ गया है।

फिदा हुसैन (बाएं) उमर राशिद (बीच में) उमर हाजम (दाएं)

कुलगाम में ही दर्जनों नेता सुरक्षा मांग रहे हैं। क्योंकि, पंचायत सदस्यों पर हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे। इससे खौफजदा कई पंचायत सदस्य इस्तीफा दे रहे हैं। तीनों युवाओं को सुपुर्द-ए-खाक किए जाने के वक्त भाजपा नेता सोफी यूसुफ ने कहा- ‘कुलगाम के एसएसपी और डीसी को तुरंत हटाया जाए। उन्होंने सुरक्षा नहीं बढ़ाई, इसलिए वारदात हुई। जब तक दोनों अफसरों को हटाया नहीं जाता, तब तक भाजपा इस जिले में किसी भी कार्यक्रम या चुनाव में भाग नहीं लेगी।’

हत्यारे आतंकी भी इसी इलाके के, दोनों लश्कर से जुड़े हैं

आईजी विजय कुमार ने कहा कि हत्या करने वाले आतंकी भी इसी इलाके के हैं। वे अल्ताफ नाम के एक स्थानीय युवक की गाड़ी में आए थे। उनके नाम निसार अहमद खांडे और अब्बास शेख हैं। ये दोनों लश्कर से जुड़े हैं।

पाकिस्तानी संसद में मंत्री के कबूलनामे के बाद भारत अब आईसीजे जाने की तैयारी में

नई दिल्ली. पुलवामा में आतंकी हमला कराने के पाकिस्तानी मंत्री फवाद चौधरी के कबूलनामे के बाद भारत अंतरराष्ट्रीय कोर्ट (आईसीजे) जा सकता है। केंद्रीय राज्य मंत्री वीके सिंह ने कहा- ‘भारत शुरू से कहता आया है कि इसमें पाकिस्तान का हाथ है। अच्छा हुआ कि उसने खुद सच्चाई स्वीकार ली है। मुझे यकीन है कि हमारी सरकार इस कबूलनामे का इस्तेमाल दुनिया को यह बताने के लिए करेगी और दुनिया पाक को एफएटीएफ से ब्लैकलिस्ट करने के लिए साथ आएगी।’ अभी पाकिस्तान ग्रे लिस्ट में है। पिछली बैठक में यह स्टेटस बरकरार रखा गया था।



आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें
कश्मीर के कुलगाम में आतंकियों की गोलियों का निशाना बने तीनों भाजपा कार्यकताओं को शुक्रवार को सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनके जनाजों में हजारों की भीड़ जुटी।


https://ift.tt/35QkyCV

Comments

Popular Posts

आप शेयर ट्रेडिंग करते हैं तो यह जानना आपके लिए जरूरी है; एक सितंबर से बदल रहा है मार्जिन का नियम

शेयर बाजार में एक सितंबर से आम निवेशकों के लिए नियम बदलने वाले हैं। अब वे ब्रोकर की ओर से मिलने वाली मार्जिन का लाभ नहीं उठा सकेंगे। जितना पैसा वे अपफ्रंट मार्जिन के तौर पर ब्रोकर को देंगे, उतने के ही शेयर खरीद सकेंगे। इसे लेकर कई शेयर ब्रोकर आशंकित है कि वॉल्युम नीचे आ जाएगा। आइए समझते हैं क्या है यह नया नियम और आपकी ट्रेडिंग को किस तरह प्रभावित करेगा? सबसे पहले, यह मार्जिन क्या है? शेयर मार्केट की भाषा में अपफ्रंट मार्जिन सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्दों में से एक है। यह वह न्यूनतम राशि या सिक्योरिटी होती है जो ट्रेडिंग शुरू करने से पहले निवेशक स्टॉक ब्रोकर को देता है। वास्तव में यह राशि या सिक्योरिटी, बाजारों की ओर से ब्रोकरेज से अपफ्रंट वसूली जाने वाली राशि का हिस्सा होती है। यह इक्विटी और कमोडिटी डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग से पहले वसूली जाती है। इसके अलावा स्टॉक्स में किए गए कुल निवेश के आधार पर ब्रोकरेज हाउस भी निवेशक को मार्जिन देते थे। यह मार्जिन ब्रोकरेज हाउस निर्धारित प्रक्रिया के तहत तय होती थी। इसे ऐसे समझिए कि निवेशक ने एक लाख रुपए के स्टॉक्स खरीदे हैं। इस...

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के 100 साल, जिसके लिए महात्मा गांधी भीख मांगने को तैयार थे

दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया (राष्ट्रीय इस्लामी विश्वविद्यालय) एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, जो आज 100 साल पूरे कर रही है। 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ़ में छोटी संस्था के तौर पर शुरू होकर एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने तक की इसकी कहानी कई संघर्षों से भरी है। गांधीजी के कहने पर ब्रिटिश शासन के समर्थन से चल रही शैक्षणिक संस्थाओं का बहिष्कार शुरू हुआ था। राष्ट्रवादी शिक्षकों और छात्रों के एक समूह ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छोड़ा और जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नींव पड़ी। स्वतंत्रता सेनानी मौलाना महमूद हसन ने 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ़ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नींव रखी। यह संस्था शुरू से ही कांग्रेस और गांधीजी के विचारों से प्रेरित थी। 1925 में आर्थिक सेहत बिगड़ी तो गांधीजी की सहायता से संस्था को करोल बाग, दिल्ली लाया गया। तब महात्मा गांधी ने यह भी कहा था- जामिया को चलना होगा। पैसे की चिंता है तो मैं इसके लिए कटोरा लेकर भीख मांगने के लिए भी तैयार हूं। बापू की इस बात ने मनोबल बढ़ाया और संस्था आगे बढ़ती रही। भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन महज 23 साल की उम्र में जामिया...